ब्रज भारतीय संस्कृति का प्रमुख केन्द्र बिन्दु है, यह जिन तत्वों से बना है, वह समूचे भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं, यहाँ का अतीत गौ पालन से प्रारम्भ होता है। पशु-पक्षी-वनस्पति एवं प्रकृति, इन सभी अवयवों का संकलन ब्रज का सौन्दर्य है। यहाँ समय-समय पर अनेक धर्म, सम्प्रदायों और जातियों का आवागमन होता रहा है, किन्तु यहाँ की मूल संस्कृति यथावत् बनी रही, वर्तमान युग अनेक क्रान्तियों के साथ इतनी त्वरित गति से परिवर्तन की ओर अग्रसरित हुआ है कि लोक संस्कृतियाँ लुप्त होने की स्थिति में पहुँच गई। इसी सोच और वैचारिकी से ब्रज संस्कृति की सुरक्षा-संरक्षा हेतु ब्रजलोक कला एवं शिल्प संग्रहालय का जन्म हुआ।
प्रमुख रूप से संस्थान ब्रज संस्कृति के वस्तु संकलन, हस्तलिखित ग्रंथों का संकलन तथा मौखिक परम्परा से प्राप्त अलिखित साहित्य का संकलन किया गया है। संस्थान द्वारा क्षेत्रीय मुक्ताकाशीय गैलरी का निर्माण करा कर दर्शकों के अवलोकनार्थ प्रस्तुत किया गया है। किसान के घर की प्राचीन चाकी, लुगदी से बने डला, लोक देवी एवं दीवाल पर छप्पर, छींका, खाट, रई व दूध विलौनी, धौनी आदि का प्रदर्शन पर्यटकों को आकर्षित कर रहा है।
श्री श्री नरहरि सेवा संस्थान ब्रज के साधु-सन्तों व महापुरूषों के वरदान का सुफल है। डॉ. उमेश चन्द्र शर्मा के मन में एक स्वप्न तैरता रहता था-ब्रज संस्कृति को विश्व संस्कृति से जोड़कर इसकी संभावनाओं का विस्तार किया जाये। इसकी चर्चा श्रीधाम वृन्दावन के तपोनिष्ठ साधु-सन्तों से करते-करते भावमग्न से हो जाते थे। श्री नरहरि दास जी महाराज की सन्निधि में 12 अगस्त 1982 को इस स्वप्न ने एक संकल्प का रूप धारण किया।
उस संकल्प का नाम था "ब्रज लोक कला एवं शिल्प संग्रहालय" इस संकल्प को क्रियान्वित करने के लिये ग्यारह वर्ष पर्यन्त अथक परिश्रम के साथ समूचे ब्रज का परिभ्रमण अध्येता-अन्वेषक की दृष्टि से किया गया, विविध ग्रंथागारों में आवश्यक अध्ययन तथा ब्रज व ब्रज के बाहर के अनेक विद्वानों से ब्रज संस्कृति और कला की सुरक्षा-संरक्षा व विकास के अनुशासनों पर चर्चा की गई, जिससे आशीर्वचन रूप में प्रोत्साहन और उचित परामर्श भी प्राप्त हुआ। ब्रज के बाहर के अनेक विद्वानों से ब्रज संस्कृति और कला की सुरक्षा-संरक्षा व विकास के अनुशासनों पर चर्चा की गई।
इसके प्रेरणा स्रोत और उत्साहवर्धन करने वाले विद्वानों में प्रज्ञा पुरूष डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल, लोक मनीषी डॉ. सत्येन्द्र, लोक ऋषि श्री देवेन्द्र सत्यार्थी, डॉ. राम नरेश त्रिपाठी आदि प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से स्मरणीय हैं। आधुनिक विद्वानों में डॉ. श्रीमती कपिला वात्सायन, डॉ. श्रीवत्स गोस्वामी, डॉ. शरण बिहारी गोस्वामी, डॉ. कल्याण कुमार चक्रवर्ती (I.A.S.), श्री ब्रज किशोर शर्मा, (I.A.S.), डॉ. कमल टावरी (I.A.S.), डॉ. ए. के. दास, डॉ. चन्द्रभान रावत, डॉ. कैलाश चन्द्र भाटिया, डॉ. हर्ष नन्दिनी भाटिया, डॉ. नीरू मिश्रा, प्रो. गोविन्द शर्मा, डॉ. नरेश चन्द्र बंसल, पद्मश्री राम स्वरुप शर्मा रासाचार्य, डॉ. श्रीभगवान शर्मा, विदेशी विद्वानों में डॉ. डेविड, डॉ. इमरे बंगा, डॉ. जैक हौले, डॉ. एलेन आदि महत् पुरूषों के आशीर्वाद से संकल्प को साकार रूप प्रदान करने हेतु 23 जुलाई 1993 को विधिवत् पंजीयन के साथ पुष्ट किया जा सका।